सम्मेद शिखरजी: जहाँ आत्मा अपने शाश्वत प्रकाश से मिलती है

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सम्मेद शिखरजी: जहाँ आत्मा अपने शाश्वत प्रकाश से मिलती है

रिपोर्ट : सौरभ गुप्ता

गिरिडीह (झारखंड)। कुछ यात्राएँ मनुष्य स्वयं चुनता है, और कुछ यात्राएँ स्वयं उसे पुकारती हैं। लगभग एक दशक बाद पुनः हुई सम्मेद शिखरजी की यात्रा केवल एक तीर्थ-दर्शन नहीं, बल्कि आत्मा के गहन स्मरण का अनुभव बन गई।

झारखंड के गिरिडीह ज़िले में मधुबन के समीप स्थित सम्मेद शिखरजी (जिसे पारसनाथ पर्वत भी कहा जाता है) जैन धर्म का सर्वोच्च सिद्ध क्षेत्र माना जाता है। मान्यता है कि यहाँ चौबीस में से बीस जैन तीर्थंकरों ने तप कर मोक्ष प्राप्त किया। यह पर्वत केवल भूगोल नहीं, बल्कि अध्यात्म का जीवंत इतिहास है।

तप, त्याग और मोक्ष की पावन भूमि

जैन आगमों और प्राचीन ग्रंथों में इस स्थल का उल्लेख दो हजार वर्षों से अधिक समय से मिलता है। मध्यकाल में यहाँ विभिन्न टोंकों का निर्माण हुआ—वे स्थान जहाँ तीर्थंकरों ने अंतिम ध्यान कर देह का परित्याग किया। इन टोंकों पर भव्य प्रतिमाएँ नहीं, बल्कि चरण-चिह्न स्थापित हैं, जो त्याग और निर्वाण की प्रतीकात्मक उपस्थिति का अनुभव कराते हैं।

प्रातःकालीन बेला में जब श्रद्धालु चढ़ाई आरंभ करते हैं, तो वातावरण में एक अद्भुत शांति अनुभव होती है। भोर की सुनहरी किरणें पर्वत को आलोकित करती हैं और हर कदम मानो आत्मा को भीतर की ओर ले जाता है।

प्रथम टोंक पर आस्था का उद्गार

भगवान पार्श्वनाथ की प्रथम टोंक पर पहुँचते ही श्रद्धालुओं की आँखें नम हो उठती हैं। वहाँ कोई आडंबर नहीं—केवल पवित्र चरण-चिह्न। यह दृश्य एक गहरी सच्चाई को प्रकट करता है कि मोक्ष किसी संप्रदाय का विशेषाधिकार नहीं, बल्कि आत्मा का स्वाभाविक अधिकार है।

श्वेतांबर, दिगंबर, तेरापंथी—सभी एक ही चरणों में नत होते दिखाई देते हैं। यहाँ संप्रदाय की सीमाएँ मिट जाती हैं और केवल भक्ति शेष रह जाती है।

नवकार मंत्र की गूँज

टोंकों पर बैठकर जब श्रद्धालु नवकार मंत्र का जाप करते हैं—

णमो अरिहंताणं

णमो सिद्धाणं

णमो आयरियाणं

णमो उवज्झायाणं

णमो लोए सव्व साहूणं।

तो वह केवल जप नहीं, बल्कि पूर्ण समर्पण का भाव बन जाता है। यह मंत्र कुछ माँगता नहीं, केवल महान आत्माओं को नमन करता है।

आत्मा की एकल यात्रा

मार्ग में नंगे पाँव साधक और वृद्ध श्रद्धालु संयमपूर्वक आगे बढ़ते दिखाई देते हैं। उनके कदम भले धीमे हों, पर आस्था दृढ़ होती है। जैन दर्शन का यह वाक्य—

“अप्पा कत्ता विकत्ता य, अप्पा हु सुहदुहाणि य।”

अर्थात आत्मा ही कर्ता और भोक्ता है—यहाँ प्रत्यक्ष अनुभव बन जाता है।

सम्मेद शिखरजी सिखाता है कि जीवन की अंतिम यात्रा आत्मा को अकेले ही तय करनी होती है। परिवार और समाज सहारा दे सकते हैं, पर मोक्ष की प्राप्ति भीतर जागृत होने वाली ज्योति से ही संभव है।

आधुनिक युग में प्रासंगिक संदेश

आज के व्यस्त और व्याकुल समय में यह पवित्र स्थल संयम, विरक्ति और आत्मचिंतन का संदेश देता है। यहाँ की नंगे पाँव चढ़ाई अहंकार को पिघला देती है और मौन आत्मा को उसके शाश्वत स्वरूप से परिचित कराता है।

जब सूर्य की किरणें शिखरों को स्वर्णिम आभा से भर देती हैं, तो मन कृतज्ञता से भर उठता है। लौटते समय श्रद्धालु के पास कोई भौतिक प्रसाद नहीं होता—केवल भीतर की स्थिरता और उजाला साथ आता है।

सम्मेद शिखरजी केवल एक तीर्थ नहीं, बल्कि एक जागरण है—एक स्मरण कि आत्मा शाश्वत है, और जिस शिखर की खोज हम बाहर करते हैं, वह हमारे अंतर्मन में ही स्थित है।

Saurabh Gupta
Author: Saurabh Gupta