
होली से पहले तेल कांड! बरेली की KEO फैक्ट्री के 8 में से 5 नमूने फेल, बाजार में मचा हड़कंप
जिस ‘चक्र’ पर था भरोसा, वही निकला अधोमानक! लैब रिपोर्ट ने उड़ाए होश
सरसों तेल में मिलावट का खेल? बड़े ब्रांड पर सवाल, उपभोक्ता सशंकित
तेल का सच सामने आते ही सेल गिरी, कारोबारियों के छूटे पसीने, भरोसे पर लगा दाग
रिपोर्ट : सौरभ गुप्ता
बरेली। होली की रंगत चढ़ने से ठीक पहले बरेली से ऐसी खबर आई है जिसने बाजार की चमक फीकी कर दी है। फरीदपुर स्थित खंडेलवाल एडिवल ऑयल फैक्ट्री से लिए गए आठ नमूनों में से पांच नमूने प्रयोगशाला जांच में अधोमानक पाए गए हैं। खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रशासन (एफएसडीए) की रिपोर्ट सामने आते ही तेल कारोबार में हलचल मच गई है।
लैब में फेल हुए नमूनों में मल्टी सोर्स एडिबल ऑयल, रिफाइंड राइस ब्रान ऑयल, रिफाइंड सोयाबीन ऑयल, रैपसीड ऑयल और कच्ची घानी सरसों तेल (चक्र ब्रांड) शामिल बताए जा रहे हैं। खास बात यह है कि जिस “चक्र” ब्रांड को उपभोक्ता शुद्धता की गारंटी मानते थे, वही लैब की कसौटी पर खरा नहीं उतरा।




बाजार में मची खलबली, सेल पर पड़ा असर
रिपोर्ट सार्वजनिक होते ही बाजार में चर्चाओं का दौर तेज हो गया है। कारोबारियों का कहना है कि जांच रिपोर्ट के बाद चक्र समेत अन्य ब्रांड की बिक्री में गिरावट देखी जा रही है। उपभोक्ता असमंजस में हैं—जिस तेल को वे रोजमर्रा की रसोई में इस्तेमाल कर रहे थे, उसकी गुणवत्ता पर सवाल उठ खड़े हुए हैं।
“पीला है तो शुद्ध है?” — बड़ा सवाल
जानकारों का कहना है कि तेल का रंग देखकर उसकी शुद्धता तय नहीं की जा सकती। जरूरी नहीं कि पीला दिखने वाला तेल पूरी तरह शुद्ध सरसों का ही हो। उत्तर प्रदेश में सरसों तेल की खपत लगातार बढ़ी है और कई कंपनियां अलग-अलग ब्रांड नामों से इसे बाजार में उतार रही हैं। लेकिन गुणवत्ता पर लगातार सवाल उठते रहे हैं।
बड़े ब्रांड भी सवालों के घेरे में?
बाजार में रविंद्रा, इंजन, फॉर्च्यून, पतंजलि, इमामी जैसे कई बड़े नाम मौजूद हैं। उपभोक्ता ब्रांड के नाम पर ज्यादा कीमत चुकाते हैं, लेकिन अब सवाल यह है कि क्या सभी ब्रांड गुणवत्ता की कसौटी पर खरे उतर रहे हैं?
एफएसडीए अगर व्यापक स्तर पर सैंपलिंग कर सभी प्रमुख ब्रांडों की लैब जांच कराए तो और भी चौंकाने वाले खुलासे सामने आ सकते हैं।


उपभोक्ता बोले – “सेहत से खिलवाड़ बर्दाश्त नहीं”
लोगों का कहना है कि खाद्य तेल सीधे स्वास्थ्य से जुड़ा मामला है। अगर गुणवत्ता में कमी पाई जाती है तो यह सिर्फ नियमों का उल्लंघन नहीं, बल्कि जनता की सेहत से खिलवाड़ है।
होली जैसे बड़े त्योहार से पहले आई यह रिपोर्ट बाजार और प्रशासन दोनों के लिए एक चेतावनी है—भरोसे की कसौटी अब सिर्फ नाम से नहीं, गुणवत्ता से तय होगी।