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एक फरवरी से पान मसाला उद्योग पर सख्ती, छोटे निर्माताओं की बढ़ी मुश्किलें

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एक फरवरी से पान मसाला उद्योग पर सख्ती, छोटे निर्माताओं की बढ़ी मुश्किलें

नया उपकर बना बड़ा संकट: छोटी पान मसाला फैक्ट्रियों पर ताले की आशंका

उत्पादन से पहले टैक्स भुगतान, छोटे कारोबारियों की पूंजी पर पड़ेगा भारी असर

रिपोर्ट : कानपुर ब्यूरो

कानपुर! पान मसाला उद्योग से जुड़े छोटे कारोबारियों के सामने पहली फरवरी से नई चुनौती खड़ी होने जा रही है। केंद्र सरकार द्वारा स्वास्थ्य और सुरक्षा उपकर लागू किए जाने के बाद छोटी पान मसाला इकाइयों पर आर्थिक दबाव तेजी से बढ़ने की आशंका जताई जा रही है।

अब तक पान मसाला निर्माण पर कम्पनसेशन सेस लागू था, जिसे उत्पादकों को टैक्स के साथ अगले माह की 20 तारीख तक जमा करना होता था। लेकिन नए नियमों के तहत अब उपकर का भुगतान उत्पादन से पहले ही हर माह की सात तारीख तक करना अनिवार्य होगा। इससे छोटे उद्योगों की कार्यशील पूंजी फंसने का खतरा बढ़ गया है।

मर्चेंट्स चैंबर की जीएसटी कमेटी के सलाहकार सीए धर्मेन्द्र श्रीवास्तव के अनुसार, 31 जनवरी को कम्पनसेशन सेस की अवधि समाप्त हो रही है और इसकी जगह नया उपकर लागू किया जा रहा है। इसके लिए प्रत्येक पान मसाला इकाई को अलग पंजीकरण कराना होगा। जिन कारोबारियों के पास एक से अधिक फैक्ट्रियां हैं, उन्हें हर इकाई के लिए अलग-अलग रजिस्ट्रेशन कराना पड़ेगा।

कानपुर और आसपास के औद्योगिक क्षेत्रों में पान मसाला की कई फैक्ट्रियां संचालित हैं। पनकी, फजलगंज, ट्रांसपोर्ट नगर, गड़रियनपुरवा, मंधना और रनिया जैसे क्षेत्रों में बड़ी और छोटी दोनों श्रेणियों की इकाइयां मौजूद हैं। नए उपकर के तहत मासिक भुगतान पैकिंग मशीनों की संख्या और उनकी अधिकतम पैकिंग क्षमता के आधार पर तय होगा।

इसके साथ ही सभी फैक्ट्री संचालकों को पैकिंग मशीनों पर सीसीटीवी कैमरे लगाना अनिवार्य होगा। इन कैमरों की रिकॉर्डिंग दो वर्षों तक सुरक्षित रखनी होगी, जिसे मांगने पर 48 घंटे के भीतर उपलब्ध कराना होगा। इससे उत्पादन लागत में और इजाफा होगा।

नियमों के उल्लंघन पर कम से कम 10 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया जाएगा। वहीं एक फरवरी से पान मसाला, सिगरेट और तंबाकू जैसे उत्पादों पर 40 प्रतिशत जीएसटी लागू होगा, जो पहले 28 प्रतिशत था। इसके अतिरिक्त उपकर अलग से देना होगा।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह उपकर साल भर में करोड़ों रुपये तक पहुंच सकता है। छोटे फैक्ट्री संचालकों के लिए इतनी बड़ी राशि अग्रिम रूप से जमा कर पाना आसान नहीं होगा। इससे कई इकाइयों के बंद होने की आशंका है। दूसरी ओर, बड़े ब्रांड इस दबाव को सहन कर सकते हैं और छोटे खिलाड़ियों के बाहर होने से उन्हें बाजार में अधिक हिस्सेदारी मिलने की संभावना है।

उपकर के असर को संतुलित करने के लिए उद्योग में दो विकल्पों पर विचार किया जा रहा है—या तो पाउच में सामग्री की मात्रा घटाई जाए या फिर कीमतों में बढ़ोतरी की जाए। हालांकि, दोनों ही स्थितियों में इसका सीधा असर उपभोक्ताओं पर पड़ेगा।

Saurabh Gupta
Author: Saurabh Gupta