नगर निगम की बड़ी चूक या प्रशासनिक अतिरेक? टिबरीनाथ मंदिर और विदेश मंत्रालय को भेजा कुर्की नोटिस

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नगर निगम की बड़ी चूक या प्रशासनिक अतिरेक? टिबरीनाथ मंदिर और विदेश मंत्रालय को भेजा कुर्की नोटिस

नाथ नगरी कॉरिडोर के बीच विवाद: टिबरीनाथ मंदिर को बकायेदार बताकर कुर्की की तैयारी

आस्था और शासन आमने-सामने: नगर निगम की सूची में टिबरीनाथ मंदिर, मचा हड़कंप

रिपोर्ट : सौरभ गुप्ता

बरेली। नगर निगम की कार्यप्रणाली एक बार फिर सवालों के घेरे में आ गई है। शहर के प्राचीन और विश्वविख्यात टिबरीनाथ मंदिर को संपत्ति कर बकाया दर्शाते हुए निगम ने कुर्की की कार्रवाई का नोटिस जारी कर दिया है। हैरानी की बात यह है कि इसी सार्वजनिक नोटिस में भारत सरकार के विदेश मंत्रालय का नाम भी शामिल है। इस घटनाक्रम से धार्मिक संगठनों और आमजन में तीखी नाराज़गी देखने को मिल रही है।

सदियों पुराने टिबरीनाथ मंदिर को नगर निगम ने बकायेदारों की सूची में शामिल करते हुए उसकी चल-अचल संपत्ति कुर्क करने की चेतावनी दी है। बताया जा रहा है कि निगम ने मंदिर परिसर और उससे जुड़ी संपत्ति को अलग-अलग इकाई मानते हुए कर निर्धारण किया है। निगम के रिकॉर्ड के अनुसार मंदिर की संपत्ति पर करीब 1.82 लाख रुपये, जबकि मुख्य मंदिर भवन पर लगभग 1.76 लाख रुपये का टैक्स बकाया दर्शाया गया है।

मामला यहीं तक सीमित नहीं है। नगर निगम द्वारा प्रकाशित सार्वजनिक नोटिस में विदेश मंत्रालय पर भी करीब 1.73 लाख रुपये की देनदारी दिखाई गई है। इसे लेकर प्रशासनिक हलकों में भी असहजता है। सवाल उठ रहे हैं कि क्या नोटिस जारी करने से पहले संबंधित विभागों और संस्थानों की विधिक स्थिति की जांच की गई थी।

नगर निगम ने नोटिस में स्पष्ट किया है कि यदि तीन दिन के भीतर बकाया टैक्स जमा नहीं किया गया, तो नगर निगम अधिनियम की धाराओं के तहत सख्त कार्रवाई की जाएगी। इसमें बैंक खातों की कुर्की के साथ-साथ भवन में मौजूद इलेक्ट्रॉनिक और अन्य सामान जब्त करने का प्रावधान भी शामिल है।

इस कार्रवाई ने इसलिए भी तूल पकड़ लिया है क्योंकि प्रदेश सरकार बरेली को ‘नाथ नगरी कॉरिडोर’ के रूप में विकसित कर रही है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के इस महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट के तहत सात नाथ मंदिरों के सौंदर्यीकरण पर करोड़ों रुपये खर्च किए जा रहे हैं। ऐसे में एक प्रमुख नाथ मंदिर के खिलाफ कुर्की नोटिस जारी होना प्रशासनिक समन्वय पर सवाल खड़े कर रहा है।

श्रद्धालुओं और सामाजिक संगठनों का कहना है कि धार्मिक स्थलों को केवल राजस्व की दृष्टि से देखना उचित नहीं है। उनका आरोप है कि यह कदम आस्था को ठेस पहुंचाने वाला है। वहीं, प्रशासनिक स्तर पर इसे प्रक्रिया संबंधी मामला बताया जा रहा है।

अब निगाहें शासन और नगर निगम के उच्चाधिकारियों पर टिकी हैं कि क्या इस नोटिस को त्रुटि मानकर वापस लिया जाएगा या फिर मामला और आगे बढ़ेगा।

Saurabh Gupta
Author: Saurabh Gupta