यूपी बीजेपी में जातीय संतुलन की कसौटी: ठाकुर-ब्राह्मण बैठकों से बढ़ी अंदरूनी बेचैनी
रिपोर्ट/सौरभ गुप्ता
लखनऊ। उत्तर प्रदेश बीजेपी में इन दिनों सब कुछ ठीक नहीं चल रहा कम से कम पार्टी के भीतर उभरती जातीय हलचल यही संकेत दे रही है।
पहले ठाकुर विधायकों की बैठक और अब ब्राह्मण विधायकों की अलग बैठक ने संगठन और सरकार दोनों के लिए असहज स्थिति पैदा कर दी है। सूत्रों की मानें तो यह महज़ संवाद या समन्वय की बैठकें नहीं, बल्कि सत्ता-संतुलन को लेकर गहराते असंतोष की अभिव्यक्ति हैं।
योगी सरकार के दूसरे कार्यकाल में ब्राह्मण नेताओं और विधायकों के बीच यह भावना मजबूत होती जा रही है कि सरकार और संगठन में उनकी भूमिका धीरे-धीरे सीमित की जा रही है।
कई ब्राह्मण विधायक मानते हैं कि नीतिगत फैसलों, प्रशासनिक नियुक्तियों और राजनीतिक संदेशों में उनकी आवाज़ उतनी प्रभावी नहीं रह गई है, जितनी पहले हुआ करती थी।
यही कारण है कि हालिया ब्राह्मण विधायकों की बैठक को केवल “आंतरिक चर्चा” कहकर टालना पार्टी नेतृत्व के लिए आसान नहीं रहा।
सूत्र बताते हैं कि ब्राह्मण विधायकों ने इस बैठक में प्रतिनिधित्व, सम्मान और निर्णय प्रक्रिया में हिस्सेदारी जैसे मुद्दों पर खुलकर बात की।
दिलचस्प यह है कि जब इससे पहले ठाकुर विधायकों की बैठक हुई थी, तब उसे “संगठनात्मक एकजुटता” और “समन्वय” का नाम दिया गया।
लेकिन ब्राह्मण विधायकों की बैठक पर पार्टी की सख्त प्रतिक्रिया ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या बीजेपी नेतृत्व जातीय असंतुलन की चर्चा से डर रहा है?
आंकड़े इस असंतोष को और धार देते हैं। यूपी की सामाजिक संरचना में ब्राह्मणों की आबादी लगभग 10–11 प्रतिशत मानी जाती है, जबकि ठाकुरों की आबादी 6–7 प्रतिशत के आसपास है। इसके बावजूद विधानसभा में ब्राह्मण विधायकों की संख्या 42 है, जबकि ठाकुर विधायकों की संख्या 45।
विधान परिषद में यह अंतर और गहरा है—जहां ब्राह्मण 14 और ठाकुर 23 हैं। यानी आबादी के अनुपात में ब्राह्मणों का प्रतिनिधित्व अपेक्षाकृत कम दिखाई देता है।
विपक्ष, खासकर समाजवादी पार्टी, इस मुद्दे को लगातार हवा देती रही है। सपा पहले भी योगी सरकार पर ब्राह्मण विरोधी होने के आरोप लगाती रही है और अब पार्टी के भीतर से उठ रही आवाज़ें विपक्ष को नया हथियार दे सकती हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि बीजेपी ने समय रहते इस असंतोष को गंभीरता से नहीं लिया, तो 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले यह मुद्दा और गहराता चला जाएगा।
सूत्रों का यह भी कहना है कि पार्टी का शीर्ष नेतृत्व किसी भी तरह के खुले जातीय ध्रुवीकरण से बचना चाहता है। यही वजह है कि ब्राह्मण विधायकों की बैठक पर कड़ा संदेश देकर यह संकेत दिया गया कि “जाति के आधार पर राजनीति” बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
लेकिन सवाल यह है कि क्या केवल अनुशासन का डंडा दिखाकर अंदरूनी असंतोष को दबाया जा सकता है?
फिलहाल, यूपी बीजेपी एक नाज़ुक मोड़ पर खड़ी है। एक तरफ चुनावी मजबूरियां हैं, दूसरी तरफ सत्ता के भीतर संतुलन बनाए रखने की चुनौती।
ठाकुर और ब्राह्मण बैठकों ने यह साफ कर दिया है कि पार्टी के भीतर सब कुछ ‘ऑल इज़ वेल’ नहीं है.
और अगर समय रहते संतुलन नहीं साधा गया, तो यह बेचैनी सियासी संकट में बदल सकती है।