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बरेली में SRMS अस्पताल से जुड़ा केस हुआ चर्चा का विषय

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बरेली में SRMS अस्पताल से जुड़ा केस हुआ चर्चा का विषय

डॉक्टर को राहत, मरीज की पीड़ा बरकरार — जांच में लापरवाही नहीं, सवाल फिर भी जिंदा…..

बरेली | 20 दिसंबर 2025 को रामपुर के एक गरीब किसान की कटी हुई उंगली का मामला भले ही कागजों में खत्म मान लिया गया हो, लेकिन दर्द आज भी जिंदा है। जांच रिपोर्ट में डॉक्टर को दोषमुक्त कर दिया गया है, मगर मरीज आज भी उस सर्जरी के बाद की पीड़ा से जूझ रहा है, जिसने उसकी जिंदगी की दिशा बदल दी।

मामला श्री राममूर्ति स्मारक मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल, भोजीपुरा से जुड़ा है, जहां मरीज नजीव आलम ने ऑर्थोपेडिक सर्जन डॉ. एस.के. कौशिक पर ऑपरेशन में लापरवाही का आरोप लगाया था। शिकायत आईजीआरएस पोर्टल के माध्यम से की गई थी, जिसने पूरे प्रकरण को चर्चा में ला दिया।

कैसे शुरू हुआ विवाद….
नजीव आलम के अनुसार, 13 अक्टूबर 2023 को उनकी दाहिनी हाथ की तर्जनी उंगली गंभीर रूप से कुचल गई थी। अस्पताल में भर्ती होने के बाद डॉक्टरों ने सर्जरी की सलाह दी। नजीव का दावा है कि इलाज के दौरान उनकी उंगली पूरी तरह काट दी गई, जिसके बाद वे शारीरिक और मानसिक रूप से टूट गए।

उनका कहना है कि अब वे न्यूरोमा नामक असहनीय दर्द की समस्या से पीड़ित हैं, जिसने उनकी रोजमर्रा की जिंदगी और कामकाज दोनों को प्रभावित किया है।

मेडिकल बोर्ड की जांच में क्या निकला……
मामले की गंभीरता को देखते हुए बरेली के मुख्य चिकित्सा अधिकारी ने दो सदस्यीय मेडिकल बोर्ड गठित किया। बोर्ड ने करीब एक सप्ताह तक मरीज के इलाज से जुड़े सभी दस्तावेज, सर्जरी रिकॉर्ड, सहमति पत्र और डॉक्टर का पक्ष जांचा।

जांच रिपोर्ट के अनुसार :—

मरीज की उंगली की स्थिति पहले से बेहद गंभीर थी……

सर्जरी से पहले लिखित सहमति पत्र लिया गया था, जिसमें उंगली अलग करने और संक्रमण के जोखिम का स्पष्ट उल्लेख था……

सर्जरी तय मेडिकल प्रोटोकॉल के अनुसार की गई……

डॉक्टर शैक्षणिक और तकनीकी रूप से पूर्णतः योग्य पाए गए……

इन्हीं आधारों पर मेडिकल बोर्ड ने डॉक्टर पर लगे सभी आरोपों को निराधार मानते हुए उन्हें क्लीन चिट दे दी।

रिपोर्ट में यह भी स्वीकार किया गया कि एम्प्यूटेशन के बाद न्यूरोमा होना एक संभावित मेडिकल रिस्क है। मगर यहीं से विवाद की असली जड़ निकलती है…..

क्या मरीज को इस दर्दनाक जटिलता के प्रभावों की पूरी गंभीरता समझाई गई थी?

क्या गरीब मरीज की सहमति वास्तव में जागरूक सहमति थी?

कागजों में इंसाफ, जमीन पर दर्द……
जांच ने डॉक्टर को राहत दे दी, लेकिन मरीज की पीड़ा पर कोई मरहम नहीं लगा। नजीव आलम अब भी खुद को विकलांग मानते हैं और उनका कहना है कि उन्होंने सिर्फ उंगली ही नहीं, अपनी आजीविका और आत्मसम्मान भी खो दिया।

यह मामला केवल एक ऑपरेशन नहीं, बल्कि स्वास्थ्य व्यवस्था और गरीब मरीजों की आवाज से जुड़ा बड़ा सवाल बनकर खड़ा है।

अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या पीड़ित पक्ष आगे किसी उच्च स्तर पर अपील करेगा या यह मामला भी फाइलों में दफन होकर रह जाएगा।

एक बात तय है,उंगली कटने का दर्द सिर्फ शरीर का नहीं होता, वह जिंदगी तक असर करता है।

Saurabh Gupta
Author: Saurabh Gupta