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उर्स-ए-आला हजरत में नई परंपरा की शुरुआत: 108 वर्षों में पहली बार होगा केवल शाकाहारी लंगर

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उर्स-ए-आला हजरत में नई परंपरा की शुरुआत: 108 वर्षों में पहली बार होगा केवल शाकाहारी लंगर

 रिपोर्ट : सौरभ गुप्ता 

बरेली। दरगाह आला हजरत के 108वें उर्स में इस बार एक ऐतिहासिक बदलाव देखने को मिलेगा। वर्षों से चली आ रही परंपरा से अलग इस बार उर्स के दौरान आने वाले सभी जायरीन के लिए केवल शुद्ध शाकाहारी लंगर की व्यवस्था की गई है। सावन माह के मद्देनज़र विभिन्न समुदायों की धार्मिक भावनाओं का सम्मान करते हुए दरगाह प्रशासन ने यह निर्णय लिया है, जिसकी विभिन्न सामाजिक और धार्मिक संगठनों ने भी सराहना की है।

दरगाह प्रमुख हजरत सुब्हान रजा खान (सुब्हानी मियां) की घोषणा के बाद उर्स की व्यवस्थाओं से जुड़े सभी लंगर आयोजकों से अपील की गई है कि वे निर्धारित व्यवस्था का पूरी तरह पालन करें। जमात रजा-ए-मुस्तफा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष एवं उर्स प्रभारी सलमान हसन खान ने कहा कि सभी समितियां केवल शाकाहारी भोजन ही तैयार करें, ताकि निर्णय का प्रभावी ढंग से पालन हो सके।

इस फैसले के बाद लंगर समितियों को अपनी तैयारियों में व्यापक बदलाव करना पड़ा। पहले से मांसाहारी व्यंजनों के लिए की गई कई बुकिंग और ऑर्डर निरस्त करने पड़े। साथ ही मांसाहारी भोजन बनाने के लिए बुलाए गए रसोइयों की जगह अब शाकाहारी व्यंजन तैयार करने वाले बावर्चियों की व्यवस्था की गई है। इस वर्ष लंगर में मटर-पनीर, दाल, सब्जी, चावल और अन्य शुद्ध शाकाहारी व्यंजन श्रद्धालुओं को परोसे जाएंगे।

उर्स के मीडिया प्रभारी नासिर कुरैशी ने बताया कि दरगाह के इतिहास में पहली बार पूरी तरह शाकाहारी लंगर की व्यवस्था की जा रही है। उनका कहना है कि यह पहल सामाजिक सद्भाव, पारस्परिक सम्मान और गंगा-जमुनी संस्कृति की भावना को और अधिक मजबूत करेगी।

इस निर्णय का स्थानीय व्यापारिक और सामाजिक संगठनों ने भी स्वागत किया है। संयुक्त व्यापार मंडल के संयोजक विशाल मेहरोत्रा, शोभित सक्सेना, संजीव औतार अग्रवाल सहित कई लोगों ने इसे आपसी भाईचारे और सामाजिक समरसता को बढ़ावा देने वाला सकारात्मक कदम बताया। उनका मानना है कि ऐसे निर्णय समाज में सौहार्द और एक-दूसरे की आस्था के सम्मान का संदेश देते हैं।

Saurabh Gupta
Author: Saurabh Gupta

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