
जोगीनवादा फायरिंग केस : ‘क्लीन चिट’ की आड़ में खेल, खाकी की मिलीभगत से खुला सिस्टम का ब्लैक स्पॉट
आठ संगीन मुकदमे, फिर भी बन गया पासपोर्ट! बीजेपी नेता के भतीजे पर मेहरबान रही वर्दी
झूठी सत्यापन रिपोर्ट पड़ी भारी, एसएसपी बरेली की दरोगा-सिपाही पर कड़ी कार्रवाई, वेतन कटा
सिस्टम हिला तो खुली फाइल, आरोपी का पासपोर्ट निरस्तीकरण की प्रक्रिया शुरू
रिपोर्ट : सौरभ गुप्ता
बरेली। कागजों की बाजीगरी और वर्दी की सांठगांठ ने एक बार फिर कानून व्यवस्था पर सवालिया निशान लगा दिया है। जोगीनवादा गोलीकांड के नामजद आरोपी सौरभ राठौर के आपराधिक रिकॉर्ड को छिपाकर पासपोर्ट बनवाने का मामला सामने आने के बाद पुलिस महकमे में हड़कंप मच गया है।
सौरभ राठौर कोई आम नाम नहीं, बल्कि वह बीजेपी के चर्चित नेता पप्पू गिरधारी का भतीजा है। पप्पू गिरधारी उत्तराखंड सरकार में कैबिनेट मंत्री रेखा आर्य के पति हैं और हाल ही में एक विवादित बयान को लेकर सुर्खियों में रहे थे। अब भतीजे को लेकर उठा यह मामला सिस्टम की साख पर सीधा वार कर रहा है।
आठ मुकदमे, फिर भी ‘क्लीन’ रिपोर्ट!
जोगीनवादा इलाके में दबंगई, फायरिंग और जानलेवा हमलों के लिए कुख्यात सौरभ राठौर के खिलाफ आठ आपराधिक मुकदमे दर्ज हैं। इनमें आर्म्स एक्ट, बलवा और जानलेवा हमला जैसे गंभीर आरोप शामिल हैं। दिसंबर 2024 में अधिवक्ता रीना सिंह के परिवार पर हमले का मामला भी इसी सूची में है।
इसके बावजूद 12 नवंबर 2024 को बारादरी थाने में तैनात दरोगा रोहित शर्मा और सिपाही दीपक तोमर ने पासपोर्ट सत्यापन रिपोर्ट में ऐसा खेल किया कि सौरभ को लगभग “दूध का धुला” साबित कर दिया गया। रिपोर्ट में सिर्फ एक पुराने मामले का उल्लेख किया गया, जिसमें वह पहले ही दोषमुक्त हो चुका था।
2025 में खुला राज, जांच में फंसे पुलिसकर्मी
मामला 2025 में उजागर हुआ, जिसके बाद वरिष्ठ अधिकारियों ने संज्ञान लिया। जांच की जिम्मेदारी मो. अकमल खान को सौंपी गई। जांच में साफ हो गया कि सत्यापन रिपोर्ट जानबूझकर भ्रामक और अधूरी थी।
जांच रिपोर्ट के आधार पर एसएसपी अनुराग आर्य ने कड़ा रुख अपनाते हुए दरोगा रोहित शर्मा और सिपाही दीपक तोमर को दोषी माना। दोनों पर सात दिन के वेतन के बराबर अर्थदंड लगाया गया है।
पासपोर्ट पर भी गिरी गाज
इतना ही नहीं, आरोपी सौरभ राठौर का पासपोर्ट निरस्त कराने की प्रक्रिया भी शुरू कर दी गई है। माना जा रहा है कि इस मामले में आगे और भी खुलासे हो सकते हैं।
यह मामला सिर्फ एक आरोपी या दो पुलिसकर्मियों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सवाल खड़ा करता है कि अगर रसूखदारों के लिए कानून यूं ही झुकता रहा, तो आम आदमी न्याय की उम्मीद किससे करे?