बरेली में ‘बुलडोजर न्याय’ की तलवार: तौकीर रजा के करीबी वाजिद बेग का बरातघर जमींदोज,
रिपोर्ट/सौरभगुप्ता
साजिश का ‘गढ़’ अब मलबे मेंतब्दील!
बरेली: उत्तर प्रदेश के बरेली शहर में एक बार फिर ‘बुलडोजर राज’ का खौफनाक मंजर देखने को मिला,
जहां मौलाना तौकीर रजा के बेहद करीबी और समाजवादी पार्टी के पूर्व पार्षद वाजिद बेग के बरातघर पर प्रशासन की तीखी कार्रवाई ने पूरे इलाके को हिलाकर रख दिया।
मंगलवार से शुरू हुई इस ध्वस्तीकरण की जंग बुधवार को भी जारी रही, और अब यह ‘पुस्तैनी हवेली’ कहलाने वाला भवन लगभग पूरी तरह मलबे में बदल चुका है।
भारी पुलिस फोर्स की छत्रछाया में पोकलेन मशीनें और बुलडोजर गरजते रहे, मानो शहर की शांति पर लगा कोई दाग मिटाने की कोशिश हो रही हो।
लेकिन वाजिद बेग के छोटे भाई आबिद बेग ने इसे सरासर अन्याय करार दिया, चीखकर कहा- “हमें बलि का बकरा बनाया जा रहा है!
यह हमारा बरातघर नहीं, बल्कि सदियों पुराना पुस्तैनी आवास है।” क्या यह कार्रवाई अवैध निर्माण के खिलाफ है, या राजनीतिक बदले की आग में झुलसती साजिश?
आइए, इस तीखी कहानी को खोलकर देखते हैं, जहां कानून की आड़ में सियासत की तलवार चल रही है।
फरीदापुर चौधरी इलाके में स्थित यह बरातघर, जो इज्जतनगर थाने के दायरे में आता है, अब प्रशासन की ‘बुलडोजर नीति’ का शिकार बन चुका है।
बरेली विकास प्राधिकरण (बीडीए) के संयुक्त सचिव दीपक कुमार की अगुवाई में टीम ने मंगलवार को कार्रवाई की शुरुआत की थी।
पहले दिन दो बुलडोजर और एक पोकलेन मशीन ने भवन के 50 फीसदी हिस्से को जमींदोज कर दिया, जैसे कोई दुश्मन किले को नेस्तनाबूद कर रहा हो।
बुधवार सुबह से ही दूसरे दौर की तबाही शुरू हो गई, जहां दो पोकलेन मशीनें लगातार ढांचे को तोड़ती रहीं, जबकि बुलडोजर तैयार खड़े थे।
दीपक कुमार ने बेबाकी से कहा, “यह एक अवैध बरातघर है। अतिक्रमण के खिलाफ कार्रवाई है, और हमने नोटिस जारी कर सुनवाई का मौका दिया था।”
लेकिन सवाल यह है कि क्या यह सिर्फ निर्माण नियमों की लड़ाई है, या 26 सितंबर के उस खूनी बवाल की सजा, जिसने पूरे बरेली को दंगे की आग में झोंक दिया था?
याद कीजिए उस काले दिन को- 26 सितंबर 2025, जब ‘आई लव मुहम्मद’ पोस्टर विवाद ने शहर को हिंसा की चपेट में ले लिया। पुलिस का दावा है.
कि इसी बरातघर में 19 सितंबर को साजिश रची गई थी। एसपी सिटी मानुष पारीक ने खुलासा किया कि मौलाना तौकीर रजा ने यहां अपने संगठन के पदाधिकारियों के साथ बैठक की, और शहर के माहौल को बिगाड़ने का पूरा प्लान तैयार किया गया।
“यह कार्रवाई बीडीए की है, लेकिन सुरक्षा हमारी जिम्मेदारी,” पारीक ने कहा। लेकिन वाजिद बेग के भाई आबिद ने इस पर तीखा पलटवार किया। मीडिया के सामने कागज लहराते हुए उन्होंने चिल्लाकर कहा, “मेरे भाई का किसी FIR में नाम नहीं है!
अगर पुलिस 26 सितंबर के बवाल में उन्हें नामजद बता रही है, तो FIR दिखाएं। यह पुश्तैनी घर है, बरातघर नहीं।
हमें चुन-चुनकर निशाना बनाया जा रहा है, जैसे हम दंगाइयों के सरगना हों!” आबिद की यह पुकार क्या राजनीतिक उत्पीड़न की हकीकत बयां कर रही है, या सिर्फ बचाव की कोशिश?
यह कार्रवाई कोई नई नहीं है। बीडीए ने पहले भी मौलाना तौकीर रजा के करीबियों पर शिकंजा कसा है। सूफी टोला में ऐवान-ए-फरहत बरातघर और गुड मैरिज हॉल पर भी बुलडोजर चला था।
वाजिद बेग, जो सपा से पार्षद रह चुके हैं, अब फरार बताए जा रहे हैं। पुलिस उनकी तलाश में दबिश दे रही है, लेकिन परिवार का कहना है कि यह selective targeting है।
“क्यों सिर्फ मुस्लिम नेताओं के घरों पर बुलडोजर? क्या हिंदू अवैध निर्माणों पर कभी ऐसा होता है?”- स्थानीय लोगों में यह सवाल गूंज रहा है।
प्रशासन का जवाब साफ है: “कानून सबके लिए बराबर। यह बिना नक्शा पास कराया गया निर्माण था, 6 अक्टूबर को सील किया गया।”
लेकिन क्या यह ‘रूटीन’ कार्रवाई है, या योगी सरकार की ‘बुलडोजर पॉलिसी’ का नया अध्याय, जहां दंगाइयों को सबक सिखाने के लिए घर उजाड़े जा रहे हैं?
बरेली का यह बवाल सिर्फ एक घटना नहीं, बल्कि सांप्रदायिक तनाव की जड़ें गहरी हैं। 26 सितंबर को हिंसा में कई घायल हुए, संपत्ति का नुकसान हुआ, और अब आरोपी के घर पर बुलडोजर।
विपक्षी नेता इसे ‘तानाशाही’ बता रहे हैं। समाजवादी पार्टी के एक नेता ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, “यह राजनीतिक परेशान किया जा रहा है। तौकीर रजा जैसे प्रभावशाली मुस्लिम नेता को कमजोर करने की साजिश।
वाजिद बेग का क्या कसूर? अगर साजिश रची गई, तो सबूत दिखाओ, घर क्यों तोड़ रहे हो?” वहीं, बीजेपी समर्थक इसे न्याय का प्रतीक मानते हैं। “दंगाइयों को बख्शा नहीं जाएगा।
वही दूसरी तरफ योगी जी का बुलडोजर हर अवैध पर चलेगा,” एक स्थानीय कार्यकर्ता ने कहा। लेकिन सवाल उठता है- क्या यह न्याय है, या बदला? परिवार की पीड़ा को कौन सुनेगा, जब घर की दीवारें गिर रही हों?
कार्रवाई के दौरान इलाका छावनी में तब्दील था। भारी पुलिस बल, ड्रोन निगरानी, और मीडिया की भीड़। आबिद बेग ने कागज दिखाते हुए कहा, “यह हमारा घर है, पीढ़ियों से।
बरातघर कहकर तोड़ रहे हैं, लेकिन कोई सबूत नहीं।” बीडीए के दीपक कुमार ने पलटवार किया, “सब प्रक्रिया पूरी की गई।
सुनवाई हुई, अपील का मौका दिया। अब कार्रवाई अंतिम चरण में है।” लेकिन स्थानीय लोग डरे हुए हैं। “आज वाजिद का घर, कल हमारा?”- फरीदापुर चौधरी में यह फुसफुसाहट है।
शहर में सांप्रदायिक सद्भाव की बातें हो रही हैं, लेकिन बुलडोजर की गर्जना सब कुछ दबा रही है।
यह घटना उत्तर प्रदेश में ‘बुलडोजर मॉडल’ की मिसाल है, जहां अवैध निर्माणों पर सख्ती से निपटा जा रहा है।
लेकिन आलोचक इसे मुस्लिम समुदाय के खिलाफ टारगेटेड बताते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने भी हाल में बुलडोजर कार्रवाई पर सवाल उठाए हैं,.
कि क्या यह कानूनी प्रक्रिया का पालन कर रही है? बरेली के इस मामले में भी, क्या वाजिद बेग को पर्याप्त मौका मिला? या यह 26 सितंबर की हिंसा का त्वरित ‘सबक’? परिवार अब अदालत का दरवाजा खटखटा सकता है, लेकिन घर तो गिर चुका है।
आपको बता चले, यह खबर सिर्फ एक भवन की तबाही नहीं, बल्कि सियासत, धर्म और कानून की जटिल लड़ाई है। बरेली में शांति बहाल करने के नाम पर क्या निर्दोषों को सजा दी जा रही है?
वाजिद बेग फरार हैं, लेकिन उनके भाई की आवाज गूंज रही है- “बलि का बकरा!” क्या प्रशासन इस पर जवाब देगा, या बुलडोजर की गर्जना जारी रहेगी? शहर अब सांस थामे इंतजार कर रहा है।