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खुसरो अस्पताल सील होने के बावजूद अन्नपूर्णा हॉस्पिटल का पंजीकरण, फिर रद्दीकरण लेकिन सील तोड़ने पर FIR क्यों नहीं?

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खुसरो अस्पताल सील होने के बावजूद अन्नपूर्णा हॉस्पिटल का पंजीकरण, फिर रद्दीकरण लेकिन सील तोड़ने पर FIR क्यों नहीं?

रिपोर्ट/सौरभ गुप्ता

सील इमारत में अस्पताल का रजिस्ट्रेशन! बरेली में CMO कार्यालय की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल

बरेली जिले में स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली एक बार फिर सवालों के घेरे में है। मिनी बाईपास रोड स्थित खुसरो अस्पताल की इमारत, जिसे विभागीय आदेश पर पहले ही सील किया जा चुका था, उसी इमारत में ‘अन्नपूर्णा हॉस्पिटल’ का नया रजिस्ट्रेशन किया गया। यह रजिस्ट्रेशन मुख्य चिकित्सा अधिकारी (सीएमओ) डॉ. विश्राम सिंह के कार्यकाल में जारी हुआ और बाद में मीडिया में मामला सामने आने पर आनन-फानन में रद्द कर दिया गया।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब इमारत पहले से सील थी, तो वहां अस्पताल का रजिस्ट्रेशन कैसे किया गया? और उससे भी गंभीर प्रश्न यह कि विभागीय सील तोड़ने जैसे स्पष्ट उल्लंघन पर नियमानुसार एफआईआर क्यों दर्ज नहीं कराई गई?

पूरे घटनाक्रम के अनुसार, सितंबर 2024 में डिप्टी सीएमओ डॉ. लईक अहमद ने खुसरो अस्पताल को फर्जी डिग्री व अन्य अनियमितताओं के आरोप में सील किया था। इसके बाद अस्पताल का पंजीकरण भी रद्द कर दिया गया। लेकिन नवंबर 2025 में खुलासा हुआ कि उसी सील लगी इमारत में किरायेनामा और नक्शा दाखिल कर ‘अन्नपूर्णा हॉस्पिटल’ के नाम से नया रजिस्ट्रेशन हासिल कर लिया गया।

स्वास्थ्य विभाग के सूत्रों का कहना है कि यह रजिस्ट्रेशन किरायेदार के नाम पर दिखाकर किया गया, जबकि क्लिनिकल एस्टेब्लिशमेंट एक्ट के तहत आवश्यक ‘नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट’ (एनओसी) नहीं लिया गया।

आरोप है कि इस प्रक्रिया में इमारत पर लगी विभागीय सील को तोड़े जाने के तथ्य को नजरअंदाज किया गया।

मामला उजागर होने के बाद सीएमओ कार्यालय ने रजिस्ट्रेशन तो रद्द कर दिया, लेकिन सील तोड़ने के मामले में न तो एफआईआर दर्ज हुई और न ही कोई स्पष्ट विभागीय कार्रवाई सामने आई। विभागीय अधिकारी डॉ. अमित कुमार की भूमिका को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं, जिन पर किरायेनामा जमा कराने का आरोप है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि मरीजों की सुरक्षा से जुड़ा गंभीर विषय है।

यदि समय रहते जांच नहीं हुई, तो यह मामला भ्रष्टाचार और नियमों की खुलेआम अनदेखी का उदाहरण बन सकता है। फिलहाल जिला प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग की चुप्पी संदेह को और गहरा रही है।

Saurabh Gupta
Author: Saurabh Gupta