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24 साल बाद बरी, लेकिन बरेली जेल में कैद: कागज़ी देरी ने छीनी आज़ादी

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24 साल बाद बरी, लेकिन बरेली जेल में कैद: कागज़ी देरी ने छीनी आज़ादी

रिपोर्ट/सौरभ गुप्ता

इलाहाबाद हाईकोर्ट से बरी होने के बाद भी मैनपुरी के आज़ाद खान की रिहाई नहीं, प्रशासन एक-दूसरे पर जिम्मेदारी डाल रहा

लखनऊ/बरेली।न्यायालय से बरी होने के बावजूद आज़ादी न मिलना सुनने में अविश्वसनीय लगता है, लेकिन मैनपुरी जिले के 45 वर्षीय आज़ाद खान के साथ यही हकीकत है।

करीब 24 साल जेल में बिताने के बाद, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महीने पहले उन्हें पूरी तरह बरी कर दिया।

फिर भी आज़ाद खान बरेली सेंट्रल जेल में बंद हैं। वजह न कोई नया मुकदमा है, न कोई सजा, बल्कि सिर्फ जेल प्रशासन तक बरी होने का आदेश नहीं पहुँचना है।

आज़ाद खान मैनपुरी के व्योती कटरा गांव के निवासी हैं। अक्टूबर 2000 में, जब वह केवल 21 वर्ष के थे, तब उन्हें देर रात हुई एक डकैती के मामले में गिरफ्तार किया गया।

अदालत ने उन्हें भारतीय दंड संहिता की धारा 395 (डकैती) और 397 (डकैती के दौरान जानलेवा हमला) के तहत दोषी ठहराया और जेल भेज दिया।

24 साल लंबी कानूनी लड़ाई के बाद, 19 दिसंबर 2025 को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अहम फैसला सुनाया।

अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष ने आज़ाद खान के खिलाफ कोई प्रत्यक्षदर्शी या ठोस सबूत पेश नहीं किया। इसी आधार पर उनकी सजा रद्द कर दी गई और उन्हें पूरी तरह बरी कर दिया गया।

इसके बावजूद आज़ाद खान अब भी जेल में हैं। पुलिस और जेल प्रशासन एक-दूसरे पर जिम्मेदारी डाल रहे हैं।

मैनपुरी के सर्किल ऑफिसर संतोष सिंह का कहना है कि उन्हें आज़ाद खान के बरी होने का कोई आधिकारिक आदेश प्राप्त नहीं हुआ है, इसलिए वे कोई कार्रवाई नहीं कर सकते। वहीं, बरेली सेंट्रल जेल प्रशासन की ओर से भी कोई स्पष्ट जवाब नहीं मिला।

यह मामला न केवल न्यायिक प्रक्रिया में देरी और लापरवाही को उजागर करता है, बल्कि एक निर्दोष व्यक्ति के जीवन के अमूल्य वर्षों के नुकसान की कहानी भी बयां करता है।

जिस व्यक्ति को कानून ने निर्दोष घोषित किया, वह आज भी जेल की दीवारों के बीच अपनी आज़ादी का इंतजार कर रहा है—सिर्फ एक कागज़ के कारण।

 

Saurabh Gupta
Author: Saurabh Gupta