ट्रेंडिंग स्टोरी
विज्ञापन

विवादित नारे पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपनाया कड़ा रुख, बेल करी ख़ारिज

Spread the love

विवादित नारे पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपनाया कड़ा रुख, बेल करी ख़ारिज

कानून से ऊपर कोई नहीं, धर्म के नाम पर हिंसा स्वीकार्य नहीं

रिपोर्ट:- सौरभ गुप्ता

बरेली। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बरेली हिंसा से जुड़े एक जमानत प्रकरण की सुनवाई करते हुए बेहद सख्त और दूरगामी टिप्पणी की है। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि किसी भी भीड़ द्वारा ऐसा नारा लगाना, जिसमें “सिर काटने” या “मौत की सजा” जैसे गैर-कानूनी दंड का आह्वान हो, न केवल भारतीय संविधान के मूल्यों के खिलाफ है, बल्कि यह सीधे तौर पर देश की संप्रभुता, कानून व्यवस्था और न्यायिक प्रणाली को चुनौती देता है।

संविधान और कानून पर सीधी टिप्पणी……

हाईकोर्ट ने कहा कि भारत का संविधान सभी नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है, लेकिन यह स्वतंत्रता असीमित नहीं है।
अनुच्छेद 19 के तहत दी गई आज़ादी पर अनुच्छेद 19(2) के अंतर्गत युक्तिसंगत प्रतिबंध लागू होते हैं। यदि कोई अभिव्यक्ति हिंसा को बढ़ावा देती है, डर का माहौल बनाती है या कानून को अपने हाथ में लेने का संदेश देती है, तो वह संरक्षित अधिकार नहीं रह जाती।

क्या था पूरा मामला…..

यह मामला 26 सितंबर 2025 का है। पुलिस को सूचना मिली थी कि बरेली के थाना कोतवाली क्षेत्र के बिहारपुर इलाके में इस्लामिया इंटर कॉलेज के आसपास बड़ी संख्या में लोग जमा हो रहे हैं।
उस समय क्षेत्र में निषेधाज्ञा (धारा 163 BNSS) लागू थी, इसके बावजूद करीब 500 से अधिक लोग इकट्ठा हुए और सरकार के खिलाफ नारेबाजी शुरू कर दी।

हिंसा, पथराव और आगजनी के आरोप…..
एफआईआर के मुताबिक:-

👉भीड़ द्वारा एक विवादित और उग्र नारा लगाया गया

👉पुलिस के हस्तक्षेप करने पर हालात बेकाबू हो गए

👉पुलिस पर पथराव, फायरिंग, पेट्रोल बम फेंकने और

👉सरकारी व निजी वाहनों को नुकसान पहुंचाने के आरोप लगे

👉इस हिंसा में कई पुलिसकर्मी घायल हुए

मौके से 7 लोगों की गिरफ्तारी हुई, जबकि बाद में 25 नामजद और लगभग 1700 अज्ञात लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया।

कोर्ट ने की अहम टिप्पणी…..

मामले की सुनवाई कर रही न्यायमूर्ति अरुण कुमार सिंह देशवाल की पीठ ने कहा:

भारत में किसी भी धर्म, समूह या व्यक्ति को यह अधिकार नहीं है कि वह कानून को दरकिनार कर अपनी सजा तय करे। भारतीय कानून में किसी भी धार्मिक अपमान के लिए सिर काटने या मौत की सजा का कोई प्रावधान नहीं है।”

अदालत ने दो टूक कहा कि ऐसे नारे कानून के शासन (Rule of Law) के खिलाफ हैं।

धार्मिक नारों पर संतुलित दृष्टिकोण

हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि:

“अल्लाहु अकबर”

“जय श्रीराम”

“हर हर महादेव”

“जो बोले सो निहाल”

जैसे धार्मिक उद्घोष सामान्य परिस्थितियों में अपराध नहीं हैं। लेकिन यदि इन्हें डर पैदा करने, हिंसा भड़काने या किसी समुदाय को धमकाने के उद्देश्य से इस्तेमाल किया जाए, तो यह आपराधिक कृत्य बन जाते हैं।

इस्लामिक शिक्षाओं का भी उल्लेख

फैसले में पैगंबर मोहम्मद के जीवन से जुड़े एक प्रसंग का उल्लेख करते हुए अदालत ने कहा कि उन्होंने अपमान सहने के बावजूद कभी हिंसा का रास्ता नहीं चुना।
कोर्ट ने टिप्पणी की कि हत्या या हिंसा का समर्थन करना न केवल भारतीय कानून के खिलाफ है, बल्कि इस्लाम के मूल सिद्धांतों के भी विपरीत है।

गंभीर धाराओं का उल्लेख

अदालत ने कहा कि इस प्रकार की गतिविधियां प्रथम दृष्टया इन धाराओं के अंतर्गत आती हैं:

धारा 152 – राज्य की संप्रभुता को चुनौती

धारा 196 – धार्मिक आधार पर वैमनस्य फैलाना

धारा 298, 299, 302 – गंभीर आपराधिक कृत्य

जमानत पर अपनाया सख्त रुख

हाईकोर्ट ने माना कि:

निषेधाज्ञा का उल्लंघन हुआ

अवैध भीड़ एकत्र हुई

हिंसा और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचा

ऐसे गंभीर आरोपों की अनदेखी कर जमानत देना न्यायोचित नहीं है।

कोर्ट ने दिया स्पष्ट संदेश

हाईकोर्ट ने अपने फैसले के जरिए देश को साफ संदेश दिया है:

“भारत में कानून सर्वोपरि है।
धर्म के नाम पर हिंसा, डर या गैर-कानूनी सजा का आह्वान न तो स्वीकार्य है और न ही संरक्षित।”

Saurabh Gupta
Author: Saurabh Gupta