
निकाह में भाईचारे की दावत बनी ‘गुनाह’? भोजीपुरा में मौलवी के इनकार से मचा बवाल
हिंदुओं को खिलाया खाना, मौलवी ने पढ़ाने से किया इनकार… फतवे से गरमाई सियासत और समाज
बरेली (भोजीपुरा)। बेटी की शादी हो और माहौल खुशियों से भरा हो—लेकिन अगर उसी खुशी में इंसानियत की खुशबू आ जाए, तो क्या वह किसी को नागवार गुजर सकती है? बरेली के भोजीपुरा में ऐसा ही एक मामला सामने आया है, जिसने समाज से लेकर सियासत तक को झकझोर कर रख दिया है।
यहां एक मुस्लिम परिवार ने बेटी के निकाह में भाईचारे की मिसाल पेश करते हुए हिंदू समाज के लोगों को भी दावत में बुला लिया। बस फिर क्या था—निकाह पढ़ाने वाले मौलवी साहब नाराज़ हो गए और निकाह पढ़ाने से ही इनकार कर दिया। आरोप है कि इसके बाद बाकायदा फतवा जारी कर दिया गया, जिससे पूरा इलाका सुलग उठा।
‘जहां इंसानियत दिखी, वहीं कट्टरता आड़े आ गई’ : पंडित सुशील पाठक
इस पूरे मामले पर समाजसेवी पंडित सुशील पाठक ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने कहा:—
“यह बेहद अफसोसनाक है कि आज भी कुछ लोग समाज को जोड़ने की बजाय तोड़ने की सोच रखते हैं। जिन लोगों ने आज़ादी के लिए साथ-साथ फांसी का फंदा चूमा, उनकी कुर्बानी को भुलाया जा रहा है।”
उन्होंने पंडित रामप्रसाद बिस्मिल और अशफाक उल्ला खां का उदाहरण देते हुए कहा कि हिंदू-मुस्लिम एकता भारत की आत्मा रही है, लेकिन आज उसी एकता को अपराध बनाया जा रहा है।
पूरा मामला क्या है?
भोजीपुरा निवासी ताहिर अली की बेटी का निकाह तय था। वर्षों से हिंदू-मुस्लिम भाईचारे के साथ रहने वाले ताहिर अली ने निकाह की दावत में अपने हिंदू परिचितों और पड़ोसियों को भी आमंत्रित किया।
जब यह बात निकाह पढ़ाने वाले मौलवी को पता चली, तो उन्होंने अचानक निकाह पढ़ाने से मना कर दिया। आरोप है कि इसके बाद परिवार को मानसिक रूप से प्रताड़ित करने के लिए फतवे जैसी बात सामने आई, जिससे घर की खुशियां मातम में बदल गईं।
1125 शादियों की मिसाल, फिर भी सवाल?
पंडित सुशील पाठक ने बताया कि वे अब तक 1125 कन्याओं के विवाह करा चुके हैं, जिनमें 10 मुस्लिम बेटियों के निकाह भी शामिल हैं।
उनका साफ कहना है—
“शादी-विवाह धर्म की दीवार नहीं, समाज को जोड़ने का पुल होता है। अगर उसी पर रोक लगेगी तो समाज किस दिशा में जाएगा?”
इलाके में उबाल, प्रशासन पर टिकी नजर
इस घटना के बाद भोजीपुरा में चर्चा तेज है। लोग इसे सामाजिक सौहार्द पर हमला बता रहे हैं। सवाल उठ रहे हैं कि क्या इंसानियत अब मजहब से कमतर हो गई है?
अब सबकी नजर प्रशासन पर है—कि वह इस संवेदनशील और भावनात्मक मामले में क्या रुख अपनाता है।